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The Media Voice

थाने वाले ‘पात्रकार’

‘थाने वाले पात्रकार’ ये हेडिंग पढ़कर आपको अजीब लग सकता है, हो सकता है आपने सोचा हो कि ‘पत्रकार’ लिखना था, गलती से ‘पात्रकार’ लिख दिया गया है। लेकिन नहीं..आपने बिल्कुल सही पढ़ा है, यह ‘थाने वाले पात्रकार’ ही लिखा है। यह शब्द मात्र शब्द नहीं, बल्कि वर्तमान पत्रकारिता में सक्रिय उन तथाकथित लोगों के लिए एक सटीक संबोधन है, जो पत्रकार बनकर आम जनता और प्रशासन के बीच खड़े होकर पत्रकारिता और पत्रकारों की छवि को धूमिल कर रहे हैं।

किसी कारणवश, एक दिन अनचाहे ही शहर के एक थाने जाना पड़ा। मामला दो लोगों के बीच का एक सामान्य आपसी विवाद का था, इसलिए एसएचओ साहब से मिलने की कोई खास आवश्यकता नहीं थी, ऊपर से वे कार्यालय में मौजूद भी नहीं थे। पूछने पर पता चला कि किसी मामले में कोर्ट गए हुए हैं तो वहीं पड़ी कुर्सियों में से एक पर बैठकर पीड़ित का प्रार्थना पत्र लिखा और उसे दिया कि जाकर ड्यूटी पर मौजूद दरोगा जी को दे दो।

काफी देर इंतजार और कई बार कहने के बाद भी सिर्फ वही घिसा-पिटा डायलॉग सुनने को मिला ‘अभी देखते हैं।’ बेवजह काफी समय गुजर जाने के बाद भी जब उस पीड़ित की एप्लिकेशन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई, तो झुंझलाहट होना स्वाभाविक था, तभी अचानक बड़े साहब की जीप थाने के गेट पर आकर रुकी।

थोड़ी देर बाद जब थाना अध्यक्ष अपने कार्यालय में बैठे, तो उनसे जाकर बात की और कहा कि पिछले सवा घंटे से आपके थाने के मुंशी साहब बैठाए हुए हैं। एक साधारण प्रार्थना पत्र लेने में इतना समय क्यों लग रहा है ?
जब अपना परिचय दिया और उन्होंने ‘पत्रकार’ शब्द सुना, तो बोले ‘अच्छा, आप भी पत्रकार हैं ?
मैंने कहा ‘जी हां, मैं पत्रकार ही हूं, लेकिन यह ‘आप भी’ का क्या मतलब है ?

वह बोले अरे, कुछ नहीं..आपको थाने में पहले नहीं देखा। बाकी कई पत्रकार तो यहां काफी समय बिताते हैं, चाहे कोई घटना हुई हो या नहीं। उनकी इस बात पर मैंने सवाल किया ‘तो क्या थाने में समय बिताने वाले को ही आप पत्रकार मानते हैं ?’
यहीं से बातचीत का असली सार शुरू हुआ।

कौन हैं ये थाने वाले पात्रकार ?

एसएचओ साहब बेहद सुलझे हुए और बौद्धिक व्यक्ति थे। उन्होंने एप्लिकेशन ली और लगभग दस मिनट की चर्चा में पूरी तस्वीर सामने आ गई।

दरअसल, कुछ पात्रकार (अब आप चाहें तो उन्हें पत्रकार ही समझ लें) ऐसे हैं जो काम हो या न हो, रोज़ाना सुबह-दोपहर-शाम थाने में लंबा समय बिताते हैं। इसी वजह से ज़्यादातर पुलिसकर्मी उन्हें पहचानते हैं। कुछ के साथ गहरा दोस्ताना रिश्ता बन जाता है, तो कुछ के साथ पकड़ मजबूत हो जाती है। इन दोनों रिश्तों के सहारे उनके ‘इधर-उधर’ वाले कई काम आसानी से निपट जाते हैं।

कई पात्रकार तो थाने में इंचार्ज से भी ज़्यादा समय बिताते हैं। वहीं, किसी चौराहे पर पुलिस की रूटीन चेकिंग हो रही हो, तो आप हर बार कुछ खास तथाकथित पत्रकारों को वहां भी देख सकते हैं। असल में यह समस्या सिर्फ पुलिस विभाग तक सीमित नहीं है।

यदि आप गौर करें, तो दलाल मानसिकता के लोग आजकल पत्रकारिता का टैग, प्रेस कार्ड और माइक लेकर अवैध धन वसूली करते हुए अन्य विभागों में भी पैठ बनाए हुए मिल जाएंगे।

अब सोचने वाली बात यह है कि यदि थाने जाना और पुलिस से जान-पहचान होना ही पत्रकार (Journalist) होने की कसौटी है, और उसी से सुनवाई आसान होती है, तो क्यों न रोज़ दो-चार घंटे थाने में ही बिताए जाएं ? इससे जान-पहचान भी बढ़ेगी, और उन तथाकथित पात्रकारों के ‘जुगाड़ तंत्र’ को नज़दीक से देखने-समझने का मौका भी मिलेगा।

अगर किसी थाने वाले पात्रकार भाई का ज़ोरदार ‘भौकाल’ हो, तो थाना परिसर के बाहर किसी कोने में ऑफिस ही क्यों न खोल लिया जाए ?

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